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ईद-उल-अधा 2024: जम्मू-कश्मीर में मुस्लिम समाज ने ऐसे मनाया बकरा ईद का त्योहार, की अमन-चैन की दुआ

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जम्मू-कश्मीर में इस वर्ष ईद-उल-अधा का त्योहार धूमधाम और उमंग के साथ मनाया गया। मुस्लिम समाज ने बड़े उत्साह के साथ इस त्योहार को मनाया, जिसमें कुर्बानी की परंपरा और धार्मिक अनुष्ठान शामिल थे।

बकरा ईद, जिसे ईद-उल-अधा भी कहा जाता है, इस्लामी कैलेंडर के अनुसार धू अल-हिज्जा महीने की 10वीं तारीख को मनाई जाती है। इस दिन को हजरत इब्राहीम की अल्लाह के प्रति आज्ञाकारिता और विश्वास के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है, जब उन्होंने अपने बेटे हजरत इस्माईल की कुर्बानी देने का निर्णय लिया था। अल्लाह ने उनकी परीक्षा लेते हुए इस्माईल की जगह एक मेमने की कुर्बानी को स्वीकार किया था।

त्योहार की तैयारी

जम्मू-कश्मीर में बकरा ईद के मौके पर बाजारों में विशेष रौनक देखने को मिली। लोग नए कपड़े, मिठाइयाँ और कुर्बानी के लिए जानवर खरीदते नजर आए। इस दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम भी किए गए ताकि त्योहार शांतिपूर्वक और सुरक्षित तरीके से मनाया जा सके।

नमाज और कुर्बानी

सुबह की नमाज के बाद, मस्जिदों और ईदगाहों में बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग इकट्ठा हुए और विशेष नमाज अदा की। इस अवसर पर इमामों ने अमन-चैन और भाईचारे की दुआ की। नमाज के बाद कुर्बानी की रस्म अदा की गई, जिसमें मेमने, बकरों और अन्य जानवरों की कुर्बानी दी गई। कुर्बानी का गोश्त तीन हिस्सों में बांटा गया – एक हिस्सा खुद के लिए, दूसरा हिस्सा रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए, और तीसरा हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों के लिए।

भोजन और खुशियाँ

कुर्बानी के बाद, परिवारों ने एक-दूसरे के घर जाकर त्योहार की बधाइयाँ दीं और विशेष पकवानों का आनंद लिया। बिरयानी, कबाब, सिवइयाँ और अन्य पारंपरिक व्यंजन इस दिन की शोभा बढ़ाते हैं। बच्चों और बड़ों ने मिलकर त्योहार की खुशियों को साझा किया और एक-दूसरे के साथ समय बिताया।

अमन-चैन की दुआ

इस अवसर पर जम्मू-कश्मीर के लोगों ने विशेष रूप से अमन-चैन की दुआ की। इमामों और धार्मिक नेताओं ने अपने संदेशों में शांति, एकता और भाईचारे को बढ़ावा देने की बात कही। उन्होंने जोर देकर कहा कि बकरा ईद का संदेश सिर्फ कुर्बानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें आपसी सद्भाव और दूसरों की मदद करने की प्रेरणा भी देता है।

निष्कर्ष

जम्मू-कश्मीर में बकरा ईद 2024 का त्योहार एकता, प्रेम और सद्भाव का प्रतीक बना। मुस्लिम समुदाय ने इस पवित्र दिन को उत्साह और धार्मिक आस्था के साथ मनाया और अल्लाह से अमन-चैन और खुशहाली की दुआ की। त्योहार के इस मौके पर पूरे प्रदेश में खुशी और सौहार्द का माहौल देखने को मिला।